Friday, October 23, 2009

Don't Ever Quit

Don't Quit




When things go wrong as they sometimes will,


When the road you're trudging seems all up hill,


When the funds are low and the debts are high


And you want to smile, but you have to sigh,


When care is pressing you down a bit,


Rest if you must, but don't you quit.


Life is queer with its twists and turns,


As every one of us sometimes learns,


And many a failure turns about


When he might have won had he stuck it out;


Don't give up though the pace seems slow--


You may succeed with another blow,


Success is failure turned inside out--


The silver tint of the clouds of doubt,


And you never can tell how close you are,


It may be near when it seems so far;


So stick to the fight when you're hardest hit--


It's when things seem worst that you must not quit.

Friday, September 25, 2009

Ethics in Relations-अन्तर प्यार और अपनेपन में_क्या झुंटे रिश्ते जीने चाहिए या उन्हें दफना देना चाहिए ?

हम हमेशा सोचते हैं की हमारे निर्णय सही हैं या नहीं ,हम जो भी कर रहे हैं ,वोह अच्छा या बुरा हैं ,ये माद्दा नहीं रखता ,पर बात तो यह है की हमारा निर्णय सही था या नहीं ,अधिकतर हमारे लिए हुए निर्णय निजी स्वार्थों से प्रेरित होते हैं ,क्या हम सबकी सोचते हैं ,क्या हम अपने पीछे मुड़कर देखता हैं किसिस निर्णय को लेते वक्त, सवाल भी हमारे हैं और जवाब भी हमें ही देने हैं |यह कहानी हैं एक छोटे से रिश्ते के दुखद और सुखद अंत की ,यह कहानी है एक रिश्ते की जो शुरू तो सच के साथ हुआ था पर खत्म हुआ झुंट की बिनाह पर ,यह कहानी है मासूमियत की ,और एक ऐसी सच्चाई की जो ,हम छोटे गाँव में रहने वालों को झुंटे स्वार्थों के साथ मिलकर ,गंदे वातावरण का हिस्सा बना देती है ,जब लोग किसी के अपनेपन को अपनी सस्ती निगाहों से देखते है ,और किसी रिश्ते को कब क्या समझ लेते हैं ,जिसे इस ब्लॉग से तो नहीं बताया जा सकता ,यह शीर्षक समर्पित है एक स्वस्थ और मासूम रिश्ते को ................यह मदद करेगा सही निर्णय लेने में ,अपने stakeholder के concern को सोचने में नाकि निजी स्वार्थों पर झुंटे रिश्तों को जीने के लिए |एक नए प्रोफेशनल को जो अपनों से दूर किसी शहर में नौकरी ,अपने काम ,और अपनी अव्यवस्थित जीवन शैली के साथ जी रहा हो ,कुछ ना कुछ अपनेपन की इच्छा तो होती ही है,वो चाह्ता है की वोह दोस्त बनाये ,नए साथी ,नया जीवन ,अपने अधूरेपन को पुरा करे जो उसे अपनों को छोड़कर मिला है ,और इसी कोशिश में वो कई ऐसे रिश्तों में भी उलझ जाता है जो निरे झुंटे हैं ,जो स्वार्थ की परिपाटी पर बने हुए हैं ,और जो केवल अपना हित पाने के लिए ही बनाये जा रहे हैं ,हाँ यहाँ एक बात जरूर बता दूँ ,की भारत Hippocrates की श्रेणी में आता है,,मतलब कई बार लोग ओछेपन के चलते ,अभावों के चलते ,ग़लत राह अपनाते हैं ,और प्यार और अपनेपन को बदनाम करते हैं ,कई बार तो दोनों को ही एक मान लेते हैं ,यह हर प्रोफेशनल के साथ होता है जो युवा और रिफ्यूजी हो गया हो ,और उसकी लडाई उसके अकेलेपन से उसके दुखो /सुखों /या भविष्य की राह बनती है |
contd...

Thursday, September 24, 2009

परदा सम्मान की रक्षा के लिए या सम्मान बचाने के लिए

पिछले कुछ महीनो से इंदौर की हवा में कुछ मैलापन सा नजर आता हैं ,और येही हालत हर महानगर समझे जाने वाले शहर की हैं ,दोस्ती जैसे रिश्तों के मायने बदल गए हैं ,लोग अपनेपन को प्यार ,और प्यार को अपनापन समझने लगे हैं |मेरी यह पोस्ट एक कोशिश हैं ,एक सीधी और सच्ची बात उन सभी के पास पहुंचाने की ,जो अभी तक नहीं जान पाये हैं ,की रिश्ते क्या होते हैं ? कैसे जिया जाता हैं उन रिश्तों को? और क्यूँ इनकी अहमियत समझना चाहिए ?
इंदौर जैसे शहर आज बाहर से आए हुए युवाओं से भरे पड़े हैं ,आज हम शिक्षा का केन्द्र माने जाते हैं ,इंदौर का एक अपना माहोल हैं ,जो आज प्रभावित सा दीखता हैं ,किसी दूसरे के कामो से,मैं ख़ुद यहाँ बाहरी हूँ ,मगर परजीवी नहीं, में सहजीवी हूँ ,किसी जगह में रहने के लिए में अपने आप को बदलूँगा बिना वहां के माहौल को नुक्सान पहुंचाए ,उस जगह को चूस के खत्म नहीं करूँगा ,और एक जिम्मेदार होने के नाते मेरा काम हैं उन सभी को इस बात का अहसास दिलाना ,की हम केवल माँ बाप के सामने ही नहीं बल्कि हर जगह ,और माँ बाप से मीलों दूर भी हम मर्यादा से बंधे हुए हैं ,हमारी अपनी सीमाएं हैं जिन्हें हम भूल जाते हैं नए शहर पहुँच के|
मेरे अनुभव हैं की चमड़ी बचाने के नाम पर इंदौर में चहरों को ,ऐसे ढंका जाता हैं जैसे मुस्लिम मुल्क की सारी कवायतों को हम ही पूरा कर रहे हों,हम बुरका नशीं हो गए हैं ,ये सही भी हैं अगर अपने धर्म के सम्मान में हो ,पर इसका प्रयोग तो हमारे बीच में लड़किया अपने आप को छुपाने में करती हैं ,ना सम्मान की रक्षा के लिए ,न धर्म के सम्मान के लिए ,पर अपने जानने वालो से अपने आप को बचाने के लिए ,क्यूंकि ये वोह लडकियां हैं ,जो परदा नशीं होके ,पहचानी नहीं जा सकती ,अपने पुरूष मित्रों के साथ घुमती हुई ,अलग अलग बाइक्स और कार में ,अलग अलग मित्रों के साथ|
ये वोह जीवनत् उदाहरण हैं उस मलिनता के ,जो अपने शहर में जाकर होनहार और शिक्षा पाने वालों में अग्रणी कहलाते हैं ,जिनके पास अपना एक गन्दा पहलु हैं ,उनकी वोह जिंदगी जो वोह दूसरे शहर की फिजा बिगाड़ कर जीते हैं ,आपने इस बात पर ध्यान दिया होगा की जेल के कैदी ,नए मुजरिम ,और मीडिया में दिखाए जाने वाले अपराधियों के चहरे पर काला कपड़ा होता है ,इसलिए ताकि गंदगी का चेहरा सबके सामने ना आए ,बाम्बे जैसे शहरों में व्यवसाय में लगी हुई संभ्रांत लड़किया जो पुलिस के द्वारा call girl होने के नाते पकड़ी जाती हैं वोह भी परदे में ही होती है ,पुणे की रेव पार्टी में पकड़ी गई सारी कोम जो शिक्षित और संभ्रांत है अपना चेहरा परदे से ढंकती हुई नजर आती है ,ताकि वोह अपने झुंटे लुटे पिटे सम्मान को बचा सके ,उन अपनों से जिनके सपने जीने वो महानगर पहुँची .यह वोह परदा है जो उस सम्मान को बचने के लिए है जो हैं नहीं ,जो झुंटा हैं ,जो दो रंगों का हैं ,अपने शहर में अलग और दूसरे शहर में अलग |
मैं ही नहीं हर भारत का रहने वाला ,उस परदे का सम्मान जरुर करता हैं ,जो माता सीता ने रावन के सामने घांस के दो टुकडों से बनाया था ,अपने सच्चे सम्मान की रक्षा के लिए ,हर मुस्लिम महिला सम्मान्न्नीय हैं जो वोह अपने मजहब ,अपनी कोम ,अपने संस्कृति के लिए करती हैं ,हर वोह परदा सही हैं जो अपने गोरी चमड़ी को धुप से बचाने के लिए हैं ,मगर हर वो परदा जो अपनी चमड़ी के दो रंगों को छुपाने और बचाने के काम आए वो कहाँ तक अच्छा हैं ,ये हमें सोचना हैं ,शुरुआत इंदौर के पुराने लोगों से हो तो और अच्छा हैं ,के हम पुनः परिभाषित करें इस परदे को ,क्या हैं ये और क्यूँ हैं ,एक शिक्षक होने के नाते ,हर बार जब हमारी student को हम शहर मैं इस दशा मैं देखते हैं परदे का प्रयोग अपने हठधर्मी स्वभाव की रक्षा करते हुए ,बाइक्स के पीछे चेहरा छुपाते हुए घूमते हुए ,हम शर्मसार होते हैं ,की एथिक्स (यह मैनेजमेंट शिक्षा की एक ब्रांच है जिसमे हम सिखाते है की धर्म व्यापार के साथ हो और इमानदार हो तभी अच्छा ) पढ़ना और उसे किसी के जीवन मैं लाना दोनों मैं बहुत अन्तर हैं ,निरर्थक लगता है एक trainer होना जो भविष्य बनाता है ,जिसके दो पहलु हैं जो अनसुलझे और भद्दे हैं , मेरी कोशिश हैं परदे को पुनाह्परिभाषित करने की ताकि इंदौर साफ़ हो ,यहाँ की मलिनता हटे ,और दाग लगाने वाले समझे या समझाए जाएँ किसी भी तरह से |
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