Wednesday, July 23, 2008

अपने लक्ष्य को पाने के लिए केवल लक्ष्य पर केंद्रित होना जरुरी है

अपने लक्ष्य को पाने के लिए केवल लक्ष्य पर केंद्रित होना जरुरी है ,वो जो लक्ष्य को पाने के दरमियान बीच में पड़ने वाली छोटी मोटी समस्याओं या चाल माया प्रलोभन में फंस जाते हैं ,वो लक्ष्य से दिग्भ्रमित होकर उससे दूर होते चले जाते हैं ,और अपना लक्ष्य कभी नहीं पा पाते हैं |
अर्जुन के लक्ष्य भेदन की चिडिया की आँख वाली कहानी सभी ने सुनी होगी ,मगर ये कहानी लक्ष्य पानी के दरमियान आने वाली परेशानियों के अलावे प्रलोभन से सम्बन्ध रखती है |
काठ कुछ इस तरह है ,एक रजा एक दिन अपने राज्य में मुनादी पिटवाता है की ,महीने के आखिरी दिन जो जो मुझसे मिलने आएगा में उसे अपने राज्य का एक हिस्सा देता जाऊँगा ,राजा के इस तरह के निर्णय पर उसके मंत्रियों और सभासदों ने उसे बहुत समझाया की राजन अगर इस तरह के निरे उपाय से आप अपना राज्य बाटेंगे तो आपका राज्य तो समाप्ति पर पहुँच जायेगा ,इस पर राजा ने बोला की जो में बोल रहा हूँ वोह राज्य हित में ही है तो मुझे वोही करने दो|
जिस दिन लोगो को राजा से मिलने आना था उस दिन राजा ने बहुत ही बढियां उत्सव की तैयारियां कारवांई ,भोग विलास नृत्य और सारे इन्तेजाम करवाए और मेला जैसा माहौल बना के रख दिया ,शराब और नर्तकों से पाट के रख दिया अपने सभागार को ,और अपने द्वार के सामने शस्त्रों से सजे सैनिक लगाकर लोगों के आने का इन्तेज़ार करने लगा | मेला शुरू हुआ और राजा का इन्तेज़ार भी लेकिन शाम होते होते कोई भी उस तक ना आया ,मंत्री को बड़ा ही आश्चर्य हुआ की कोई क्यूँ मुफ्त में बटने वाला राज्य लेने के लिए आगे नही आया |
असल में राज्य के सारे लोग सुरा और काम में ऐसे डूबे की उन्हें राजा के पास जाने की सुध ही नहीं रही ,कुछ नशे में डूबे रहे ,कुछ नाचने वाली लड़कियों में डूब गए ,कुछ उत्सव के आनंद में सब भूल गए ,लेकिन उनमें एक ऐसा भी आदमी था जो हर छलावे को छोड़ता हुआ राजा के पास जाने की कोशिश कर रहा था ,ना उसे मदिरा रोक पायी ना ही नृत्य और काम ,वोह तो बस राजा से मिलने के नशे में राजा के पास पहुच गया ,तब राजा ने अपने मंत्री को बोला की यह है हमारे राज्य का उत्तराधिकारी क्यूंकि हमारे राज्य में केवल इसके लक्ष्य को कोई नहीं रोक पाया और राजा ने अपना सारा राज्य उसे सौंप दिया |
कथा का सार ये की जब आप किसी लक्ष्य को पाने के लिए बिना किसी प्रलोभन या प्रपंच में फंसे आगे बढ़ते है तो आपका लक्ष्य आपके और भी नजदीक आया जाता है |इस लिए लक्ष्य पाने के लियी रास्ते में आने वाले छोटे मोटे प्रलोभन और समस्याओं को दरकिनार कर देना चाहिए |

Saturday, July 19, 2008

गुरु के साथ किया हुआ छल सरे छलों से भयावह और दुष्परिणाम देने वाला होता है

गुरु के साथ किया हुआ छल सरे छलों से भयावह और दुष्परिणाम देने वाला होता है
आज के समय में ग़लत कार्य, छल,लोगो को धोखा देना ,आम बातें हो गई हैं |लोग सभी के साथ बिना सोचे विचारे छल और कपट करते हैं ,ये कथा छल के दुष्परिणाम से सम्बंधित है ,खासतौर पर गुरु के साथ किया हुआ छल ,पुराने समय में गुरु को सम्मान और पद प्रतिष्ठा देना किसी शिष्य का मूल कर्तव्य होता था |लोग गुरु आदेश को ही सर्वोपरि मानते थे ,राजा बलि जैसे प्रतापी और शूरवीर राजा ने वामन अवतार लिए हुए श्री विष्णु के आगे घुटने टेक दिए थे ,द्रोणाचार्य के सामने एकलव्य ने अपने दाएं हाथ का अंगूठा देकर गुरु शिष्य परम्परा का एक ऐसा उदहारण दिया था जो आज तक अमिट है ,आज के समय में ना तोह गुरु शिष्य परम्परा ही बची है ना ही गुरु का सम्मान जीवित है ,लोग केवल आपसी स्वार्थ निकालने के लिए और छोटे छोटे फायदों के लिए गुरु को धोखा देने में और छल कपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं ,कथा का सार बस येही है की गुरु से किया हुआ छल केवल दुष्परिणाम देता हैं और बहुत ज्यादा भयावह होता है ,इसी सन्दर्भ में कथा आगे है ,
महाभारत काल की बात है ,कर्ण को धनुर्विद्या सिखने के लिए श्री परशुराम को गुरु बनने का विचार आता है ,लेकिन वो यह भी जानता है ,की परशुराम कट्टर ब्रह्मण वादी है और किसी क्षत्रिय को ज्ञान नहीं देंगे ,वो केवल ब्रह्मिनो को ही शास्त्र विद्या सिखाते हैं ,यह सब देखकर करना श्री परशुराम के साथ छल करता है ,और एक ब्रह्मण बनकर शस्त्र विद्या ग्रहण कर लेता है ,जब वोह अपनी शस्त्र विद्या में निपुण हो जाता है तब किसी दिन भगवन परशुराम कर्ण के साथ पेड़ की छावं में विश्राम करने के लिए रुक जाते हैं ,और विश्राम करने के लिए कर्ण की गोद में सर रखकर सो जाते हैं ,कर्ण को इस विश्राम के समय कोई जहरीला जीव जांघ पर दंश मार देता है ,और कर्ण की जांघ से खून निकालने लगता है ,कर्ण ये सोचकर की कहीं गुरु की नींद भंग ना हो इस कष्ट को सहता रहता है ,और गुरु के नींद से जागने के इन्तेजार करता है |
काफ़ी समय के बाद जब परशुराम की नींद खुलती है ,वो कर्ण की जांघ से खून बहता हुआ देखकर और कर्ण का संयम और धैर्य देखकर संशय में पड़ जाते हैं ,और कर्ण से पूंछते हैं की तुम ब्रह्मण नहीं हो सकते ,क्यूंकि ब्रह्मण की शक्ति में इतना कष्ट सहना नहीं होता है ,बताओ की तुम किस वर्ण से हो ,और तब कर्ण को सत्य बताना पड़ता है की वोह एक क्षत्रिय है ,कर्ण के इस छल से परशुराम कुपित हो जाते हैं ,और उसे श्राप देते हैं की जो ज्ञान तुमने छल और कपट से अर्जित किया है वोह समय आने पर तुम्हारे काम नहीं आएगा ,और येही महाभारत के युध्द के समय चरितार्थ भी होता है ,अर्जुन के साथ धनुर्युद्ध के समय कर्ण वोह सारा ज्ञान जो परशुराम से सीखा था भूल जाता है और पराजय को प्राप्त हो जाता है ,इसी लिए कभी गुरु के साथ छल और कपट जैसे कार्य नहीं करने चाहिए क्यूंकि इनके दूरगामी परिणाम हमेशा भयावह होते हैं |

अमितोम

Friday, July 11, 2008

ग़लत दिशा आपकी दशा बदल सकती है और ग़लत दशा आपकी दिशा बदल सकती है

ग़लत दिशा आपकी दशा बदल सकती है और ग़लत दशा आपकी दिशा बदल सकती है ,
जीवन में उठाया हुआ एक ग़लत कदम कई पीढियों तक जीवन की दिशा और दशा बदल देता है |लोग बिना सोचे विचारे जीवन में बड़े बड़े निर्णय ले लेते हैं ,वोह यह विचार भी नहीं करते की ,किस निर्णय के क्या दूरगामी परिणाम होंगे ,भविष्य में क्या असर पड़ेगा ,इसी कथन पर एक कथा है ,जो एक राजा की है ,एक बार एक राजा को राज्य छोड़कर भागना पड़ा ,दुश्मनों का वर्चस्व होने के कारण राजा को अपना परिवार लेकर राज्य से भागना पड़ा |
अपने विश्वासपात्र लोगों के पास जाकर राजा गुप्त रूप से रहने लगा ,राजा के साथ उसकी बेटी भी थी ,राज्य छोड़ने के बाद भी राजा ने अपनी बेटी को सारे संस्कार और मान मर्यादाएं सिखायीं ,समय गुजरता गया और बेटी भी उम्र के साथ बड़ी होती गई ,राजा की बेटी को आस पास रहने वाले एक संगीतकार से प्यार हो गया ,और वोह चुपचाप वहां से भागने का विचार बनाने लगी ,इस सब की भनक राजा को ला गई ,राजा सधर्मी और सद्भावी था सो उसने इस सब को सम्हालने की के लिए ख़ुद ही अपनी बेटी की मदद करने का मन बनाया ,उसे पता था की उसकी बेटी ग़लत निर्णय कर रही है और परिणाम भी ग़लत ही भोगेगी ,सो उसे सही राह पे लाने के लिए ,उसने अपनी बेटी के पास जाकर कहा की अगर तुम पलायन करके ही जीवन बसना चाहती हो ,तो मेरी मदद मांगने में क्या जाता है ,इस जंगल में पैदल कितना भागोगी ,मेरे दो घोडों में से एक ले जाओ |बेटी को लगा की उसके पिता उसकी मदद कर रहे है तो घोडे लेकर ही जाना चाहिए |
राजा ने अपनी बेटी के सामने दो घोडे खड़े कर दिए ,एक बूढा घोड़ा और एक जवान घोडी ,और कहा की इन दोनों में अपने अपने गुन हैं ,जो घोड़ा तुम्हें ठीक लगे उसे लेकर चली जाओ ,बेटी के मन में गुणों की बात सुनकर कुछ आशंका आई सो उसने अपने पिता से पूंछा की आप ही इनके गुन बता दो की क्यूँ में इनमे से कोई एक घोड़ा लेकर जाऊं ,राजा ने दोनों घोडो के बारे में बताना शुरू किया ,की यह बूढा घोड़ा सामान्य गति से दौड़ता है ,ख़ुद के निर्णय पर चलता है ,खानदानी है ,हमारे खानदान की इसके खानदान के कई पूर्वजों ने सेवा की है ,इसमें कोई कमी नहीं है ,है तो बस यह की यह धीमे धीमे और साधारण गति से चलता है ,और मेरी राय में तुम्हें येही घोड़ा ले जाना चाहिए ,बेटी को लगा की पिता मदद के नाम पर धीमी चल वाला घोड़ा देके उसके किए धराये पे पानी फेरना चाहते हैं सो वोह पिता से बोली की आप ,मुझे यह जवान घोडी क्यूँ नहीं देते ,क्या गुन हैं इसके यह भी बताईये ,राजा बोला की यह घोडी जवान है ,हष्ट पुष्ट है ,बिजली की तेजी से भागती है ,सब गुन ही गुन हैं इसमें,बस एक दुर्गुण है इसमें ,इसकी माँ की माँ ने अपने बच्चे को जन्मे देते समय पानी देख लिया था और पानी से डरने लगी थी तोह यह पानी से डरने का गुन इसके सारे खानदान में गया है ,यह दौड़ती तेज़ है मगर पानी देखकर ठिठक जाती है |और निरंकुश हो जाती है यहाँ तक की स्वर को भी चोट पहुंचा देती है |
राजा का इतना कहना था की उसकी बेटी उल्टे पांव वापस लौट गई और घर से भागने का विचार छोड़ दिया ,कारण था वो संस्कार जो राजा ने उसे दिए थे ,समझार को इशारा काफ़ी ,बूढा घोड़ा दिखाकर राजा ने अपने आप को इंगित किया था ,अपने खानदान को दिखाया था ,बताया था की धीमे चलने से और सही निर्णय से जीवन सुधार जा सका है ,वहीँ उस जवान घोडी को दिखाकर उसने अपनी बेटी की होने वाली दुराशा दिखाई थी मकी जब दुर्गुण ,और ग़लत निर्णय ले लिए जाते हैं तो वोह खून का हिस्सा बनकर कई पीढियां बर्बाद कर देते हैं ,जल्दबाजी के निर्णय केवल कष्ट देते है और कुछ भी नहीं |जब घोडी की माँ की माँ के गुन और डर ,आज कई पीढियों के बाद घोडी में मौजूद है तोह स्वाभाविक है की बेटी का आज उठाया हुआ ग़लत कदम कई पीढियों की दिशा और दशा बदल देगा |येही वह ज्ञान था जो एक बूढा बाप अपनी जवान बेटी को देना चाहता था |
निर्णय भविष्य देखके लिए जाएँ तो अच्छा ,निर्णय शास्त्र सांगत हो तो अच्छा ,निर्णय पारिवारिक सहमती और सन्मति से हो तो अच्छा ,और सबसे बड़ी बात निर्णय धीरे धीरे और सोचसमझकर लिए जाय तो बहुत ही अच्छा क्यूंकि
ग़लत दिशा आपकी दशा बदल सकती है और ग़लत दिशा आपकी दशा बदल सकती ही
अमितोम

Wednesday, July 9, 2008

यह जीवन कर्मो को करने के लिए है ,ना की फल की चिंता करने के लिए

यह जीवन कर्मो को करने के लिए है ,ना की फल की चिंता करने के लिए ,व्यक्ति को अपने कर्म करते रहना चाहिए ,बिना यह विचारे की उसके कर्मो का फल उसे कब कैसे मिलेगे ,एक तर्क येभी है कि व्यक्ति के कर्म उसके भविष्य के जीवन के निर्माण करते करते सद्कर्मी अच्छा जीवन और मोक्ष पाते हैं और दुष्कर्मी बार बार इस दुनिया में कष्ट भोगने को आते हैं ,इसी परिपक्ष्य में एक कथा है |
एक साधू ब्रह्म मुहुर्त में उठकर सूर्य नमस्कार करने के लिए नदी में गया और भगवन से रोज कि तरह प्रार्थना करने लगा ,उसी समय उसे पानी में डूबता हुआ एक बिच्छू दिखा ,उसे पानी में डूबता हुआ देखकर साधू को उसपे दया आई और सद्कर्मी स्वभाव का होने के कारन उसने उसे बचने कि कोशिश में उसे हाथ से उठाकर बचने कि कोशिश की ,जितनी बार साहू ने उसे उठाने की कोशिश की उतनी ही बार साधू को बिच्छू ने अपने डंक से दंष दिया ,साधू बार बार बिच्छू के डंक से चोट खा रहा था और दर्द से तड़पता हुआ भी बिच्छू को बचने की कोशिश कर रहा था , ये सब तट पर खड़ा हुआ एक आदमी देख रहा था और उसे यह सब बड़ा हास्यास्पद लग रहा था |साधू को कई डंक खाने के बाद भी बिच्छू के लिए स्नेहिल होके बचाते हुए देखकर उससे रहा नहीं गया और उसने साधू से पुँछ लिया की हे महात्मन ,"मैं आपको कितने कष्ट के साथ कितनी देर से इस बिच्छू के डंक खाता देख रहा हूँ और तोह भी आप की दया है की खत्म होती ही नहीं है ,आप डंक खाते हैं कष्ट मैं तड़पते हैं और फ़िर से इस निरे बिच्छू को बचाने मैं लग जाते हैं ,क्या कारण है इसका ,क्यूँ इतना कष्ट सह रहे हैं आप ,मरने दीजिये इस बिच्छू को ,ऐसे दुष्ट को बचाने का कोई फायदा नहीं है |"
इस पर साधू का जवाब था की हे भले इंसान ,मुझे अच्छा लगा कि तुम लोगो का भला सोचते हो ,लेकिन इस सब को जो तुम देख रहे हो ,तुम्हे क्या समझ रहा है ,मैं एक साधू हूँ मेरा स्वभाव है जनसेवा और जीव सेवा ,मैं वही कर रहा हूँ और मुझे ये बिच्छू बार बार डंक मारकर याद दिला रहा है कि अपने से पीछे मत हटो ,जब यह बिच्छू अपना डंक माने का स्वभाव छोड़ने को तैयार नहीं है तोह मैं तो एक साधू ठहरा मैं कैसे अपना भला करने का स्वभाव छोडूं |यह जितनी बार मुझे डंक मारता है ,उतनी बार मुझे मेरे कर्मो कि और झुकाता है ऐसा लगता है कि यह मूक जीव मुझे अहसास दिला रहा हो कि जब यह अपनी दुष्ट प्रकृति नहीं छोड़ना चाहता तोह मैं कैसे अपनी साद प्रवृत्ति छोडूं |इसी लिए मैं और यह अपने अपने कर्म कर रहे हैं ,क्यूंकि ईश्वर ने हमें हमारे कर्मो को करने के लिए ही जन्म दिया है ,परिणामो को सोचने के लिए नहीं |
कथा का सार ये कि आप अपने कर्म करें परिणाम कि चिंता करना हमारा काम नहीं है |