Friday, September 25, 2009

Ethics in Relations-अन्तर प्यार और अपनेपन में_क्या झुंटे रिश्ते जीने चाहिए या उन्हें दफना देना चाहिए ?

हम हमेशा सोचते हैं की हमारे निर्णय सही हैं या नहीं ,हम जो भी कर रहे हैं ,वोह अच्छा या बुरा हैं ,ये माद्दा नहीं रखता ,पर बात तो यह है की हमारा निर्णय सही था या नहीं ,अधिकतर हमारे लिए हुए निर्णय निजी स्वार्थों से प्रेरित होते हैं ,क्या हम सबकी सोचते हैं ,क्या हम अपने पीछे मुड़कर देखता हैं किसिस निर्णय को लेते वक्त, सवाल भी हमारे हैं और जवाब भी हमें ही देने हैं |यह कहानी हैं एक छोटे से रिश्ते के दुखद और सुखद अंत की ,यह कहानी है एक रिश्ते की जो शुरू तो सच के साथ हुआ था पर खत्म हुआ झुंट की बिनाह पर ,यह कहानी है मासूमियत की ,और एक ऐसी सच्चाई की जो ,हम छोटे गाँव में रहने वालों को झुंटे स्वार्थों के साथ मिलकर ,गंदे वातावरण का हिस्सा बना देती है ,जब लोग किसी के अपनेपन को अपनी सस्ती निगाहों से देखते है ,और किसी रिश्ते को कब क्या समझ लेते हैं ,जिसे इस ब्लॉग से तो नहीं बताया जा सकता ,यह शीर्षक समर्पित है एक स्वस्थ और मासूम रिश्ते को ................यह मदद करेगा सही निर्णय लेने में ,अपने stakeholder के concern को सोचने में नाकि निजी स्वार्थों पर झुंटे रिश्तों को जीने के लिए |एक नए प्रोफेशनल को जो अपनों से दूर किसी शहर में नौकरी ,अपने काम ,और अपनी अव्यवस्थित जीवन शैली के साथ जी रहा हो ,कुछ ना कुछ अपनेपन की इच्छा तो होती ही है,वो चाह्ता है की वोह दोस्त बनाये ,नए साथी ,नया जीवन ,अपने अधूरेपन को पुरा करे जो उसे अपनों को छोड़कर मिला है ,और इसी कोशिश में वो कई ऐसे रिश्तों में भी उलझ जाता है जो निरे झुंटे हैं ,जो स्वार्थ की परिपाटी पर बने हुए हैं ,और जो केवल अपना हित पाने के लिए ही बनाये जा रहे हैं ,हाँ यहाँ एक बात जरूर बता दूँ ,की भारत Hippocrates की श्रेणी में आता है,,मतलब कई बार लोग ओछेपन के चलते ,अभावों के चलते ,ग़लत राह अपनाते हैं ,और प्यार और अपनेपन को बदनाम करते हैं ,कई बार तो दोनों को ही एक मान लेते हैं ,यह हर प्रोफेशनल के साथ होता है जो युवा और रिफ्यूजी हो गया हो ,और उसकी लडाई उसके अकेलेपन से उसके दुखो /सुखों /या भविष्य की राह बनती है |
contd...

2 comments:

Udan Tashtari said...

निश्चित ही सावर्थ और स्वहित में बनाये गए रिश्ते बेमानी होते हैं...आप जारी रहें तब शायद आपकी बात ज्यादा स्पष्ट हो ..

Akash Jain said...

Everybody in this world is selfish and considering other as selfish person...... U have to think before taking any decision putting yourself into the shoes of other...