Tuesday, August 31, 2010

धर्म की नीलामी कहाँ तक उचित

धर्म की नीलामी कहाँ तक उचित

बीते दिन की बड़ी धार्मिक खबरों में से एक थी ,जैन धर्म के गुरु राष्ट्रसंत हमेन्द्र सूरीश्वर जी का  निधन ,धर्म को एक बड़ा घाटा हुआ ,जिसकी परिपूर्ति मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है! मुद्ददे की बात ये की अगले दिन के समाचार पत्र ने स्वामी की मौत को कैसे उजागर किया ,जैसे मदर टरेसा की मौत पर हुआ होगा ,लोगों ने ढेरों श्रद्धांजलि दी होंगी ,मोमबत्तियां जलाई होंगी ,या किसी और हिन्दू संत की मौत पर होता ,लोग लाखों की भीड़ में इस शव यात्रा में शामिल होते और याद करते एक महान शक्शियत को |
यहाँ जो नजारा देखने को मिला वोह बदला हुआ ही था ,आचार्य जी की मृत देह को ३.३० घंटे तक घुमाया गया ,इसलिए नहीं की आम इंसान को उनके दर्शन लाभ हों बल्कि इसलिए कि १५ करोड़ रुपयों कि बोली लगा  सके उनके क्रियाकर्म के इच्छुक लोगो को इस कार्य का मौका दिया जा सके ,२.३० कि. मी. तक दोल को घुमाया गया उन लोगों को ढूँढने  के लिए जो स्वामी जी के अंतिम संस्कार का हिस्सा  बनना चाहते है  ,वो भी अपना ओहदा ,रुतबा और पैसा दिखाकर, कलयुग में पैसा कुछ भी खरीद सकता है ,लो जैन धर्म में तो पुण्य भी बिक रहा है ,ऐसा लगता है जैसे पुरातन धर्मवादी स्वर्ग में घुसने का प्रमाण पत्र बेंच रहा हो, मेरा सवाल ये कि उन गरीबों का क्या जो पुण्य कमाना चाहते है पर पुण्य खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं ,नीलामी पृथा के साथ धर्मं गुरु कि देह को सुपुर्दे खाक किया गया ,हिसाब जो अख़बार ने लिखा वोह पढ़कर आम इन्सान कि रूह कांप जाए ,क्यूंकि इतना महंगा पुण्य तो उसकी सात पुश्तें ना खरीद पाएं ,३१ बोलियाँ ,सबसे छोटी बोली १ करोड़ रूपये कि ,जिसमें आचार्य के लोच  संस्कार,स्नान,पहला कन्धा ,अग्नि संस्कार सबको बेंच डाला गया |
यह जैन धर्म कि पुरानी परंपरा बन चुका है जिसे ये धार्मिक नीलामी कहते है ,बड़ा सवाल यह कि जब हमारा देश हाई क्लास,मिडल  क्लास और लो क्लास लोगो से मिलकर बना है ,तो क्या धर्मं के भी इतने टुकड़े करना उचित है ,अमीर हाई क्लास पुण्य को खरीद सकते हैन ,वोह नीलामी में हिस्सा ले सकते है ,और ३ करोड़ १२ लाख १२ हजार १२ सौ १२ रुपयों में करोरो की आस्था का सूत्र अपने नाम कर लेते है ,please  कमेन्ट करें ,की क्यों किसी गरीब या आचार्य भक्त को उन्हें बिना मुद्रा मूल्य के मुखाग्नि देने पर विचार नहीं किया गया |

धार्मिक चोट लगने के लिए मोआफी चाहता हूँ ,मगर क्या जैन धर्मं को ये सब हिंसा नहीं लगता ,मानसिक हिंसा जो लोगों के जेब टटोलकर की जा रही है ,धर्म को निलाम करके की जा रही है ,गरीब को उसका ओछा पन महसूस करा के की जा रही है ,और रहीस को स्वर्ग के दरवाजे की टिकेट बेंच के  की जा  रही है  |

आपके सुझाव आमंत्रित है |

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