Friday, July 4, 2008

ईशवर आपकी हर इच्छा को पूरा करता है |समय बदल सकता है |

ईशवर आपकी हर इच्छा को पूरा करता है समय बदल सकता है

हम हर समय भगवानसे कुछ न कुछ मांगते रहते हैं ,और हमारी मांग पुरी ना हो पाने पर नकारात्मक बातें भी करते हैं की भगवान ने हमारी इच्छा पूरी नहीं की लेकिन यह ग़लत है की ईशवर आपके मांगने पर आपको कुछ नहीं देता वोह तो आपको बिना मांगे सब दे देता है बस देर सबेर हो जाती है
द्रष्टान्त इसी तर्क को सिद्ध करता है की भगवान से माँगा हुआ कभी ना कभी पूरा होता है बस आपको सही समय का इंतज़ार करना है और अपने विश्वास को जिंदा रखना है
एक समय के बड़े ही प्रतापी राजा थे बलि ,एक समय वे अपने राज्य में विश्व जीतने का यज्ञ करवा रहे थे ,जहाँ उनकी बहेन भी मौजूद थी ,श्री विष्णु इस यज्ञ को भंगा करने के लिए वामन अवतार लेकर पहुंचे थे ,जब विष्णु के वामन अवतार रूप को राजा बलि की बहेन ने देखा तोह वोह वात्सल्य भाव से भर गई और मन में प्रार्थना की की हे प्रभु ऐसे शिशु को माता के सामान दूध पिलाने का सौभाग्य मुझे देना ,श्री विष्णु ने उनके इस विचार को जान लिया और तथास्तु बोल दिया
कुछ समय बाद भगवान ने राजा बलि का दंभ समाप्त कर दिया और यज्ञ का विध्वंश कर डाला ,वामन अवतार के ऐसे कार्य को देखकर राजा बलि की बहेन ने मन में फ़िर विचार किया की प्रभु ऐसे शिशु को तोह में ज़हर पिला के मार दूँभगवान ने फ़िर से उनकी सी इच्छा पर तथास्तु की मोहर लगा दी
समय बीत गया और विष्णु कृष्ण बनकर अवतरित हुए ,और यहाँ उन्होंने राजा बलि की बहन की दोनों इच्छाएं एक साथ पूरी की,कंस की भेजी हुई राक्षसी पूतना ,जो पूर्व जन्मे में राजा बलि की बहेन थी ,ने माता यशोदा से अनुमति मांग कर कृष्ण को नवजात रूप में दुग्ध पान भी कराया और अपनी दूसरी इच्छा के अनुरूप ज़हर भी पिलाया, ईशवर ने उनकी दोनों इच्छाएं पूरी की ,उन के वात्सल्य भाव को भी पूरा किया और उनके बदले की भी पूर्ति की
कथा का सार ये है की सदा ईशवर पे भरोसा रखें ,धनात्मक सोचें ,कहीं आप भी राजा बलि की बहन की तरह कुछ ग़लत सोचकर प्राणों को ना त्याग दें ,ईशवर आपकी हर बात सुनता है और पूरी करता है

अमितोम

Wednesday, July 2, 2008

जीवन में संयम हो तो आपके पास सब है

जीवन में संयम हो तो आपके पास सब है
जीवन में संयम और सहनशीलता की उतनी ही आव्यशकता है जितनी गुणों और अन्य अवयवों की ,सुकरातजिन्हें विश्व के महान दार्शनिकों में से एक माना जाता है ,ने इसी गुन का समावेश अपने अन्दर किया था !
सुकरात जितने ज्यादा ज्ञानी ,दार्शनिंक और प्रतिभावान थे ,प्रकृति ने उन्हें उतना ही कुरूप और भद्दा शरीर दिया था सुकरात की पत्नी बहुत ही ज्यादा रूपवान थी ,वोह जब भी सुकरात को पुस्तकों के साथ देखती सुकरात को उतनी ही जली कटी बातें सुनाती ,अपने क्रोधी और चिढ से भरे स्वाभाव के कारन वोह सुकरात को कोसती रहती की येही करना था तो ब्याह भी इन्ही किताबों से कर लेना था ,और अपने भाग्य पर सुकरात को पति के रूप में पाकर वोह हमेशा दुखी रहती थी |सुकरात का संयम और धीरज इतना ज्यादा था की वोह अपनी पत्नी की बातो को हँसते मुस्कुराते सुनते रहते थे और कोई प्रतिकार भी नहीं करते थे |

एक बार सुकरात से शिक्षा लेने के लिए उनके ! कुछ शिष्य उनके पास आए ,सुकरात की पत्नी इस दरमियान बहुत ज्यादा चिढी हुई थी और क्रोध में अनर्गल बातें कर रही थी ,जब सुकरात शिष्यों के साथ विचार विमर्श कर रहे थेउनकी पत्नी ने इस चर्चा को दूभर सा कर दिया |सुकरात के शिष्य इस बात को ना ही बर्दाश्त कर पा रहे थे ही पचाही पा रहे थे और सुकरात अपने मुख पर मीठी मुस्कराहट लिए बैठे थे ,जैसे उन्हें कोई फर्क ही ना पड़ रहा हो ,इसीबीच सुकरात की पत्नी ने क्रोध में आकर सुकरात पर कीचड़ लाकर उडेल दिया ,सुकरात तो भी शांत थे और मुस्कुरा रहे थे ,लेकिन सुकरात की पत्नी के इस कृत्य से उनके एक शिष्य को बड़ी खीज हुई की वोह चिल्ला उठा "गुरु जी यह स्त्री तो आपके काबिल ही नहीं है जो यह आपका सम्मान नहीं करना जानती ",इस पर सुकरात का जवाब थाकी क्रोध मत करो शिष्य ,मेरी पत्नी मेरा सबसे बड़ा सहारा है ,मेरी उन्नति में चाहे वोह दार्शनिक हो या आत्मिकक्यूंकि यह बार बार मेरे संयमी होने की परीक्षा लेती है ,पता करती है की कहीं दंभ में आकर में अपने आप को बड़ातो नहीं समझने लगा हूँ या अपना धीरज संयम और संयत व्यवहार तो नहीं भूल गया हूँ ,वोह मुझे थोक मुझे अहसास कराती रहती है की संयम और धीरज से सब पाया जा सकता है युद्ध रोके जा सकते हैं ,विवादों को शुरूहोने से पहले ही खत्म किया जा सकता है |मुझसे बड़ी दार्शनिक तोह यह है जो ख़ुद को जलाके मुझे रौशनी दिखातीहै और मेरे कारन संसार को प्रकाश मिलता है |धन्य है इश्वर का जो ऐसी देवी मुझे पत्नी रूप में दी|

काठ का सार ये की जीवन में संयम विजय की ओर ले जाता है और क्रोध की आखिरी दवा संयम ही है |


अमितोम