जीवन में संयम और सहनशीलता की उतनी ही आव्यशकता है जितनी गुणों और अन्य अवयवों की ,सुकरातजिन्हें विश्व के महान दार्शनिकों में से एक माना जाता है ,ने इसी गुन का समावेश अपने अन्दर किया था !
सुकरात जितने ज्यादा ज्ञानी ,दार्शनिंक और प्रतिभावान थे ,प्रकृति ने उन्हें उतना ही कुरूप और भद्दा शरीर दिया था सुकरात की पत्नी बहुत ही ज्यादा रूपवान थी ,वोह जब भी सुकरात को पुस्तकों के साथ देखती सुकरात को उतनी ही जली कटी बातें सुनाती ,अपने क्रोधी और चिढ से भरे स्वाभाव के कारन वोह सुकरात को कोसती रहती की येही करना था तो ब्याह भी इन्ही किताबों से कर लेना था ,और अपने भाग्य पर सुकरात को पति के रूप में पाकर वोह हमेशा दुखी रहती थी |सुकरात का संयम और धीरज इतना ज्यादा था की वोह अपनी पत्नी की बातो को हँसते मुस्कुराते सुनते रहते थे और कोई प्रतिकार भी नहीं करते थे |
एक बार सुकरात से शिक्षा लेने के लिए उनके ! कुछ शिष्य उनके पास आए ,सुकरात की पत्नी इस दरमियान बहुत ज्यादा चिढी हुई थी और क्रोध में अनर्गल बातें कर रही थी ,जब सुकरात शिष्यों के साथ विचार विमर्श कर रहे थेउनकी पत्नी ने इस चर्चा को दूभर सा कर दिया |सुकरात के शिष्य इस बात को ना ही बर्दाश्त कर पा रहे थे न ही पचाही पा रहे थे और सुकरात अपने मुख पर मीठी मुस्कराहट लिए बैठे थे ,जैसे उन्हें कोई फर्क ही ना पड़ रहा हो ,इसीबीच सुकरात की पत्नी ने क्रोध में आकर सुकरात पर कीचड़ लाकर उडेल दिया ,सुकरात तो भी शांत थे और मुस्कुरा रहे थे ,लेकिन सुकरात की पत्नी के इस कृत्य से उनके एक शिष्य को बड़ी खीज हुई की वोह चिल्ला उठा "गुरु जी यह स्त्री तो आपके काबिल ही नहीं है जो यह आपका सम्मान नहीं करना जानती ",इस पर सुकरात का जवाब थाकी क्रोध मत करो शिष्य ,मेरी पत्नी मेरा सबसे बड़ा सहारा है ,मेरी उन्नति में चाहे वोह दार्शनिक हो या आत्मिकक्यूंकि यह बार बार मेरे संयमी होने की परीक्षा लेती है ,पता करती है की कहीं दंभ में आकर में अपने आप को बड़ातो नहीं समझने लगा हूँ या अपना धीरज संयम और संयत व्यवहार तो नहीं भूल गया हूँ ,वोह मुझे थोक मुझे अहसास कराती रहती है की संयम और धीरज से सब पाया जा सकता है युद्ध रोके जा सकते हैं ,विवादों को शुरूहोने से पहले ही खत्म किया जा सकता है |मुझसे बड़ी दार्शनिक तोह यह है जो ख़ुद को जलाके मुझे रौशनी दिखातीहै और मेरे कारन संसार को प्रकाश मिलता है |धन्य है इश्वर का जो ऐसी देवी मुझे पत्नी रूप में दी|
काठ का सार ये की जीवन में संयम विजय की ओर ले जाता है और क्रोध की आखिरी दवा संयम ही है |
अमितोम
No comments:
Post a Comment