Saturday, July 19, 2008

गुरु के साथ किया हुआ छल सरे छलों से भयावह और दुष्परिणाम देने वाला होता है

गुरु के साथ किया हुआ छल सरे छलों से भयावह और दुष्परिणाम देने वाला होता है
आज के समय में ग़लत कार्य, छल,लोगो को धोखा देना ,आम बातें हो गई हैं |लोग सभी के साथ बिना सोचे विचारे छल और कपट करते हैं ,ये कथा छल के दुष्परिणाम से सम्बंधित है ,खासतौर पर गुरु के साथ किया हुआ छल ,पुराने समय में गुरु को सम्मान और पद प्रतिष्ठा देना किसी शिष्य का मूल कर्तव्य होता था |लोग गुरु आदेश को ही सर्वोपरि मानते थे ,राजा बलि जैसे प्रतापी और शूरवीर राजा ने वामन अवतार लिए हुए श्री विष्णु के आगे घुटने टेक दिए थे ,द्रोणाचार्य के सामने एकलव्य ने अपने दाएं हाथ का अंगूठा देकर गुरु शिष्य परम्परा का एक ऐसा उदहारण दिया था जो आज तक अमिट है ,आज के समय में ना तोह गुरु शिष्य परम्परा ही बची है ना ही गुरु का सम्मान जीवित है ,लोग केवल आपसी स्वार्थ निकालने के लिए और छोटे छोटे फायदों के लिए गुरु को धोखा देने में और छल कपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं ,कथा का सार बस येही है की गुरु से किया हुआ छल केवल दुष्परिणाम देता हैं और बहुत ज्यादा भयावह होता है ,इसी सन्दर्भ में कथा आगे है ,
महाभारत काल की बात है ,कर्ण को धनुर्विद्या सिखने के लिए श्री परशुराम को गुरु बनने का विचार आता है ,लेकिन वो यह भी जानता है ,की परशुराम कट्टर ब्रह्मण वादी है और किसी क्षत्रिय को ज्ञान नहीं देंगे ,वो केवल ब्रह्मिनो को ही शास्त्र विद्या सिखाते हैं ,यह सब देखकर करना श्री परशुराम के साथ छल करता है ,और एक ब्रह्मण बनकर शस्त्र विद्या ग्रहण कर लेता है ,जब वोह अपनी शस्त्र विद्या में निपुण हो जाता है तब किसी दिन भगवन परशुराम कर्ण के साथ पेड़ की छावं में विश्राम करने के लिए रुक जाते हैं ,और विश्राम करने के लिए कर्ण की गोद में सर रखकर सो जाते हैं ,कर्ण को इस विश्राम के समय कोई जहरीला जीव जांघ पर दंश मार देता है ,और कर्ण की जांघ से खून निकालने लगता है ,कर्ण ये सोचकर की कहीं गुरु की नींद भंग ना हो इस कष्ट को सहता रहता है ,और गुरु के नींद से जागने के इन्तेजार करता है |
काफ़ी समय के बाद जब परशुराम की नींद खुलती है ,वो कर्ण की जांघ से खून बहता हुआ देखकर और कर्ण का संयम और धैर्य देखकर संशय में पड़ जाते हैं ,और कर्ण से पूंछते हैं की तुम ब्रह्मण नहीं हो सकते ,क्यूंकि ब्रह्मण की शक्ति में इतना कष्ट सहना नहीं होता है ,बताओ की तुम किस वर्ण से हो ,और तब कर्ण को सत्य बताना पड़ता है की वोह एक क्षत्रिय है ,कर्ण के इस छल से परशुराम कुपित हो जाते हैं ,और उसे श्राप देते हैं की जो ज्ञान तुमने छल और कपट से अर्जित किया है वोह समय आने पर तुम्हारे काम नहीं आएगा ,और येही महाभारत के युध्द के समय चरितार्थ भी होता है ,अर्जुन के साथ धनुर्युद्ध के समय कर्ण वोह सारा ज्ञान जो परशुराम से सीखा था भूल जाता है और पराजय को प्राप्त हो जाता है ,इसी लिए कभी गुरु के साथ छल और कपट जैसे कार्य नहीं करने चाहिए क्यूंकि इनके दूरगामी परिणाम हमेशा भयावह होते हैं |

अमितोम

1 comment:

Unknown said...

Guru hamesha se samman ke patra rahe hai aur unhe samman dena hi hamara dharm v hai hamesha apne guru ka samman kare chahe unhone apko chhota se chhota gyan hi kyu na diya ho.