धर्म की नीलामी कहाँ तक उचित
बीते दिन की बड़ी धार्मिक खबरों में से एक थी ,जैन धर्म के गुरु राष्ट्रसंत हमेन्द्र सूरीश्वर जी का निधन ,धर्म को एक बड़ा घाटा हुआ ,जिसकी परिपूर्ति मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है! मुद्ददे की बात ये की अगले दिन के समाचार पत्र ने स्वामी की मौत को कैसे उजागर किया ,जैसे मदर टरेसा की मौत पर हुआ होगा ,लोगों ने ढेरों श्रद्धांजलि दी होंगी ,मोमबत्तियां जलाई होंगी ,या किसी और हिन्दू संत की मौत पर होता ,लोग लाखों की भीड़ में इस शव यात्रा में शामिल होते और याद करते एक महान शक्शियत को |
यहाँ जो नजारा देखने को मिला वोह बदला हुआ ही था ,आचार्य जी की मृत देह को ३.३० घंटे तक घुमाया गया ,इसलिए नहीं की आम इंसान को उनके दर्शन लाभ हों बल्कि इसलिए कि १५ करोड़ रुपयों कि बोली लगा सके उनके क्रियाकर्म के इच्छुक लोगो को इस कार्य का मौका दिया जा सके ,२.३० कि. मी. तक दोल को घुमाया गया उन लोगों को ढूँढने के लिए जो स्वामी जी के अंतिम संस्कार का हिस्सा बनना चाहते है ,वो भी अपना ओहदा ,रुतबा और पैसा दिखाकर, कलयुग में पैसा कुछ भी खरीद सकता है ,लो जैन धर्म में तो पुण्य भी बिक रहा है ,ऐसा लगता है जैसे पुरातन धर्मवादी स्वर्ग में घुसने का प्रमाण पत्र बेंच रहा हो, मेरा सवाल ये कि उन गरीबों का क्या जो पुण्य कमाना चाहते है पर पुण्य खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं ,नीलामी पृथा के साथ धर्मं गुरु कि देह को सुपुर्दे खाक किया गया ,हिसाब जो अख़बार ने लिखा वोह पढ़कर आम इन्सान कि रूह कांप जाए ,क्यूंकि इतना महंगा पुण्य तो उसकी सात पुश्तें ना खरीद पाएं ,३१ बोलियाँ ,सबसे छोटी बोली १ करोड़ रूपये कि ,जिसमें आचार्य के लोच संस्कार,स्नान,पहला कन्धा ,अग्नि संस्कार सबको बेंच डाला गया |
यह जैन धर्म कि पुरानी परंपरा बन चुका है जिसे ये धार्मिक नीलामी कहते है ,बड़ा सवाल यह कि जब हमारा देश हाई क्लास,मिडल क्लास और लो क्लास लोगो से मिलकर बना है ,तो क्या धर्मं के भी इतने टुकड़े करना उचित है ,अमीर हाई क्लास पुण्य को खरीद सकते हैन ,वोह नीलामी में हिस्सा ले सकते है ,और ३ करोड़ १२ लाख १२ हजार १२ सौ १२ रुपयों में करोरो की आस्था का सूत्र अपने नाम कर लेते है ,please कमेन्ट करें ,की क्यों किसी गरीब या आचार्य भक्त को उन्हें बिना मुद्रा मूल्य के मुखाग्नि देने पर विचार नहीं किया गया |
धार्मिक चोट लगने के लिए मोआफी चाहता हूँ ,मगर क्या जैन धर्मं को ये सब हिंसा नहीं लगता ,मानसिक हिंसा जो लोगों के जेब टटोलकर की जा रही है ,धर्म को निलाम करके की जा रही है ,गरीब को उसका ओछा पन महसूस करा के की जा रही है ,और रहीस को स्वर्ग के दरवाजे की टिकेट बेंच के की जा रही है |
आपके सुझाव आमंत्रित है |
This page is meant for business ethics,niti shastra ,for the ethical behavior
Tuesday, August 31, 2010
Friday, July 9, 2010
My Request to all
Dear Students ,
Business Ethics for Third Semester was completed with all depth and knowledgefull pedagogy all course content have also been provided to the students via http://www.socialdarshan.blogspot.com ,in this sem Yr 2009 , but I am feeling too much regrets from side of someof my students ,who are claiming that the course has not been covered up by me ,my only question arises here is that if these are those students who gave me 100 % attendance in Business Ethics classes ,or had came to me for any querry ,course content ,cases ,they nor participated in any workshop by me ,I think only 33 % students were there who were attending the classes on daily basis-and they are the only one who can complaint or comment on me ,and as a pride I will also say that though were Section "C" B.E. Mgmt Students.I want to say only this to all ,if you cant respect some one, please dont try to make him down cause of your mistakes and your faults ,those who have not attended my classes do not have any right to make any comments on me, I do not wish to work in an enviroment where these persons are listened without any base,this was the only reason I left it ,in future also there is no thought in my mind to join a deseased organization which is having ill employees and students ,and as I have left the organization please dont try to make me down cause it is wrong in every manner "aap apni galtiyon ke liye doosron ko jimmedar nahin bana sakte ",whoever it is ,although I am responcible for those who have attended my classes in last session ,please mail me on gmail for any querry or comment or any request for downloading contents, This is shamefull and awfull for me as a faculty that I taught this kinda students !
Thanks !
Wednesday, May 19, 2010
Business Ethics by Amitom Pandey Part I ,please download by the link below
"A moral or ethical statement may assert that some particular action is right or wrong; or that some actions of certain kinds are so; it may offer a distinction between good and bad characters or dispositions; or it may propound some principle from which more detailed judgements of these sorts might be inferred - for example that we ought always aim at the general happiness or try to minimize the total suffering of all sentient beings, or ... That it is right and proper for everyone to look after himself. All such statements express first order ethical judgements of different degrees of generality."
J L Mackie 1977
Get the link below ,with all the best please mail me your queries ,better to follow me on Orkut /Twitter @amitom
J L Mackie 1977
Get the link below ,with all the best please mail me your queries ,better to follow me on Orkut /Twitter @amitom
Wednesday, February 17, 2010
ETHICS PRESENTATIONS
Dear All,
please download previous presentation on Business Ethics by the links below .
Thanks and Regards !
please download previous presentation on Business Ethics by the links below .
Thanks and Regards !
Sunday, January 17, 2010
Friday, October 23, 2009
Don't Ever Quit
Don't Quit
When things go wrong as they sometimes will,
When the road you're trudging seems all up hill,
When the funds are low and the debts are high
And you want to smile, but you have to sigh,
When care is pressing you down a bit,
Rest if you must, but don't you quit.
Life is queer with its twists and turns,
As every one of us sometimes learns,
And many a failure turns about
When he might have won had he stuck it out;
Don't give up though the pace seems slow--
You may succeed with another blow,
Success is failure turned inside out--
The silver tint of the clouds of doubt,
And you never can tell how close you are,
It may be near when it seems so far;
So stick to the fight when you're hardest hit--
It's when things seem worst that you must not quit.
Friday, September 25, 2009
Ethics in Relations-अन्तर प्यार और अपनेपन में_क्या झुंटे रिश्ते जीने चाहिए या उन्हें दफना देना चाहिए ?
हम हमेशा सोचते हैं की हमारे निर्णय सही हैं या नहीं ,हम जो भी कर रहे हैं ,वोह अच्छा या बुरा हैं ,ये माद्दा नहीं रखता ,पर बात तो यह है की हमारा निर्णय सही था या नहीं ,अधिकतर हमारे लिए हुए निर्णय निजी स्वार्थों से प्रेरित होते हैं ,क्या हम सबकी सोचते हैं ,क्या हम अपने पीछे मुड़कर देखता हैं किसिस निर्णय को लेते वक्त, सवाल भी हमारे हैं और जवाब भी हमें ही देने हैं |यह कहानी हैं एक छोटे से रिश्ते के दुखद और सुखद अंत की ,यह कहानी है एक रिश्ते की जो शुरू तो सच के साथ हुआ था पर खत्म हुआ झुंट की बिनाह पर ,यह कहानी है मासूमियत की ,और एक ऐसी सच्चाई की जो ,हम छोटे गाँव में रहने वालों को झुंटे स्वार्थों के साथ मिलकर ,गंदे वातावरण का हिस्सा बना देती है ,जब लोग किसी के अपनेपन को अपनी सस्ती निगाहों से देखते है ,और किसी रिश्ते को कब क्या समझ लेते हैं ,जिसे इस ब्लॉग से तो नहीं बताया जा सकता ,यह शीर्षक समर्पित है एक स्वस्थ और मासूम रिश्ते को ................यह मदद करेगा सही निर्णय लेने में ,अपने stakeholder के concern को सोचने में नाकि निजी स्वार्थों पर झुंटे रिश्तों को जीने के लिए |एक नए प्रोफेशनल को जो अपनों से दूर किसी शहर में नौकरी ,अपने काम ,और अपनी अव्यवस्थित जीवन शैली के साथ जी रहा हो ,कुछ ना कुछ अपनेपन की इच्छा तो होती ही है,वो चाह्ता है की वोह दोस्त बनाये ,नए साथी ,नया जीवन ,अपने अधूरेपन को पुरा करे जो उसे अपनों को छोड़कर मिला है ,और इसी कोशिश में वो कई ऐसे रिश्तों में भी उलझ जाता है जो निरे झुंटे हैं ,जो स्वार्थ की परिपाटी पर बने हुए हैं ,और जो केवल अपना हित पाने के लिए ही बनाये जा रहे हैं ,हाँ यहाँ एक बात जरूर बता दूँ ,की भारत Hippocrates की श्रेणी में आता है,,मतलब कई बार लोग ओछेपन के चलते ,अभावों के चलते ,ग़लत राह अपनाते हैं ,और प्यार और अपनेपन को बदनाम करते हैं ,कई बार तो दोनों को ही एक मान लेते हैं ,यह हर प्रोफेशनल के साथ होता है जो युवा और रिफ्यूजी हो गया हो ,और उसकी लडाई उसके अकेलेपन से उसके दुखो /सुखों /या भविष्य की राह बनती है |
contd...
contd...
Thursday, September 24, 2009
परदा सम्मान की रक्षा के लिए या सम्मान बचाने के लिए
पिछले कुछ महीनो से इंदौर की हवा में कुछ मैलापन सा नजर आता हैं ,और येही हालत हर महानगर समझे जाने वाले शहर की हैं ,दोस्ती जैसे रिश्तों के मायने बदल गए हैं ,लोग अपनेपन को प्यार ,और प्यार को अपनापन समझने लगे हैं |मेरी यह पोस्ट एक कोशिश हैं ,एक सीधी और सच्ची बात उन सभी के पास पहुंचाने की ,जो अभी तक नहीं जान पाये हैं ,की रिश्ते क्या होते हैं ? कैसे जिया जाता हैं उन रिश्तों को? और क्यूँ इनकी अहमियत समझना चाहिए ?
इंदौर जैसे शहर आज बाहर से आए हुए युवाओं से भरे पड़े हैं ,आज हम शिक्षा का केन्द्र माने जाते हैं ,इंदौर का एक अपना माहोल हैं ,जो आज प्रभावित सा दीखता हैं ,किसी दूसरे के कामो से,मैं ख़ुद यहाँ बाहरी हूँ ,मगर परजीवी नहीं, में सहजीवी हूँ ,किसी जगह में रहने के लिए में अपने आप को बदलूँगा बिना वहां के माहौल को नुक्सान पहुंचाए ,उस जगह को चूस के खत्म नहीं करूँगा ,और एक जिम्मेदार होने के नाते मेरा काम हैं उन सभी को इस बात का अहसास दिलाना ,की हम केवल माँ बाप के सामने ही नहीं बल्कि हर जगह ,और माँ बाप से मीलों दूर भी हम मर्यादा से बंधे हुए हैं ,हमारी अपनी सीमाएं हैं जिन्हें हम भूल जाते हैं नए शहर पहुँच के|
मेरे अनुभव हैं की चमड़ी बचाने के नाम पर इंदौर में चहरों को ,ऐसे ढंका जाता हैं जैसे मुस्लिम मुल्क की सारी कवायतों को हम ही पूरा कर रहे हों,हम बुरका नशीं हो गए हैं ,ये सही भी हैं अगर अपने धर्म के सम्मान में हो ,पर इसका प्रयोग तो हमारे बीच में लड़किया अपने आप को छुपाने में करती हैं ,ना सम्मान की रक्षा के लिए ,न धर्म के सम्मान के लिए ,पर अपने जानने वालो से अपने आप को बचाने के लिए ,क्यूंकि ये वोह लडकियां हैं ,जो परदा नशीं होके ,पहचानी नहीं जा सकती ,अपने पुरूष मित्रों के साथ घुमती हुई ,अलग अलग बाइक्स और कार में ,अलग अलग मित्रों के साथ|
ये वोह जीवनत् उदाहरण हैं उस मलिनता के ,जो अपने शहर में जाकर होनहार और शिक्षा पाने वालों में अग्रणी कहलाते हैं ,जिनके पास अपना एक गन्दा पहलु हैं ,उनकी वोह जिंदगी जो वोह दूसरे शहर की फिजा बिगाड़ कर जीते हैं ,आपने इस बात पर ध्यान दिया होगा की जेल के कैदी ,नए मुजरिम ,और मीडिया में दिखाए जाने वाले अपराधियों के चहरे पर काला कपड़ा होता है ,इसलिए ताकि गंदगी का चेहरा सबके सामने ना आए ,बाम्बे जैसे शहरों में व्यवसाय में लगी हुई संभ्रांत लड़किया जो पुलिस के द्वारा call girl होने के नाते पकड़ी जाती हैं वोह भी परदे में ही होती है ,पुणे की रेव पार्टी में पकड़ी गई सारी कोम जो शिक्षित और संभ्रांत है अपना चेहरा परदे से ढंकती हुई नजर आती है ,ताकि वोह अपने झुंटे लुटे पिटे सम्मान को बचा सके ,उन अपनों से जिनके सपने जीने वो महानगर पहुँची .यह वोह परदा है जो उस सम्मान को बचने के लिए है जो हैं नहीं ,जो झुंटा हैं ,जो दो रंगों का हैं ,अपने शहर में अलग और दूसरे शहर में अलग |
मैं ही नहीं हर भारत का रहने वाला ,उस परदे का सम्मान जरुर करता हैं ,जो माता सीता ने रावन के सामने घांस के दो टुकडों से बनाया था ,अपने सच्चे सम्मान की रक्षा के लिए ,हर मुस्लिम महिला सम्मान्न्नीय हैं जो वोह अपने मजहब ,अपनी कोम ,अपने संस्कृति के लिए करती हैं ,हर वोह परदा सही हैं जो अपने गोरी चमड़ी को धुप से बचाने के लिए हैं ,मगर हर वो परदा जो अपनी चमड़ी के दो रंगों को छुपाने और बचाने के काम आए वो कहाँ तक अच्छा हैं ,ये हमें सोचना हैं ,शुरुआत इंदौर के पुराने लोगों से हो तो और अच्छा हैं ,के हम पुनः परिभाषित करें इस परदे को ,क्या हैं ये और क्यूँ हैं ,एक शिक्षक होने के नाते ,हर बार जब हमारी student को हम शहर मैं इस दशा मैं देखते हैं परदे का प्रयोग अपने हठधर्मी स्वभाव की रक्षा करते हुए ,बाइक्स के पीछे चेहरा छुपाते हुए घूमते हुए ,हम शर्मसार होते हैं ,की एथिक्स (यह मैनेजमेंट शिक्षा की एक ब्रांच है जिसमे हम सिखाते है की धर्म व्यापार के साथ हो और इमानदार हो तभी अच्छा ) पढ़ना और उसे किसी के जीवन मैं लाना दोनों मैं बहुत अन्तर हैं ,निरर्थक लगता है एक trainer होना जो भविष्य बनाता है ,जिसके दो पहलु हैं जो अनसुलझे और भद्दे हैं , मेरी कोशिश हैं परदे को पुनाह्परिभाषित करने की ताकि इंदौर साफ़ हो ,यहाँ की मलिनता हटे ,और दाग लगाने वाले समझे या समझाए जाएँ किसी भी तरह से |
अपने विचार नीचे प्रेषित करें |
इंदौर जैसे शहर आज बाहर से आए हुए युवाओं से भरे पड़े हैं ,आज हम शिक्षा का केन्द्र माने जाते हैं ,इंदौर का एक अपना माहोल हैं ,जो आज प्रभावित सा दीखता हैं ,किसी दूसरे के कामो से,मैं ख़ुद यहाँ बाहरी हूँ ,मगर परजीवी नहीं, में सहजीवी हूँ ,किसी जगह में रहने के लिए में अपने आप को बदलूँगा बिना वहां के माहौल को नुक्सान पहुंचाए ,उस जगह को चूस के खत्म नहीं करूँगा ,और एक जिम्मेदार होने के नाते मेरा काम हैं उन सभी को इस बात का अहसास दिलाना ,की हम केवल माँ बाप के सामने ही नहीं बल्कि हर जगह ,और माँ बाप से मीलों दूर भी हम मर्यादा से बंधे हुए हैं ,हमारी अपनी सीमाएं हैं जिन्हें हम भूल जाते हैं नए शहर पहुँच के|
मेरे अनुभव हैं की चमड़ी बचाने के नाम पर इंदौर में चहरों को ,ऐसे ढंका जाता हैं जैसे मुस्लिम मुल्क की सारी कवायतों को हम ही पूरा कर रहे हों,हम बुरका नशीं हो गए हैं ,ये सही भी हैं अगर अपने धर्म के सम्मान में हो ,पर इसका प्रयोग तो हमारे बीच में लड़किया अपने आप को छुपाने में करती हैं ,ना सम्मान की रक्षा के लिए ,न धर्म के सम्मान के लिए ,पर अपने जानने वालो से अपने आप को बचाने के लिए ,क्यूंकि ये वोह लडकियां हैं ,जो परदा नशीं होके ,पहचानी नहीं जा सकती ,अपने पुरूष मित्रों के साथ घुमती हुई ,अलग अलग बाइक्स और कार में ,अलग अलग मित्रों के साथ|
ये वोह जीवनत् उदाहरण हैं उस मलिनता के ,जो अपने शहर में जाकर होनहार और शिक्षा पाने वालों में अग्रणी कहलाते हैं ,जिनके पास अपना एक गन्दा पहलु हैं ,उनकी वोह जिंदगी जो वोह दूसरे शहर की फिजा बिगाड़ कर जीते हैं ,आपने इस बात पर ध्यान दिया होगा की जेल के कैदी ,नए मुजरिम ,और मीडिया में दिखाए जाने वाले अपराधियों के चहरे पर काला कपड़ा होता है ,इसलिए ताकि गंदगी का चेहरा सबके सामने ना आए ,बाम्बे जैसे शहरों में व्यवसाय में लगी हुई संभ्रांत लड़किया जो पुलिस के द्वारा call girl होने के नाते पकड़ी जाती हैं वोह भी परदे में ही होती है ,पुणे की रेव पार्टी में पकड़ी गई सारी कोम जो शिक्षित और संभ्रांत है अपना चेहरा परदे से ढंकती हुई नजर आती है ,ताकि वोह अपने झुंटे लुटे पिटे सम्मान को बचा सके ,उन अपनों से जिनके सपने जीने वो महानगर पहुँची .यह वोह परदा है जो उस सम्मान को बचने के लिए है जो हैं नहीं ,जो झुंटा हैं ,जो दो रंगों का हैं ,अपने शहर में अलग और दूसरे शहर में अलग |
मैं ही नहीं हर भारत का रहने वाला ,उस परदे का सम्मान जरुर करता हैं ,जो माता सीता ने रावन के सामने घांस के दो टुकडों से बनाया था ,अपने सच्चे सम्मान की रक्षा के लिए ,हर मुस्लिम महिला सम्मान्न्नीय हैं जो वोह अपने मजहब ,अपनी कोम ,अपने संस्कृति के लिए करती हैं ,हर वोह परदा सही हैं जो अपने गोरी चमड़ी को धुप से बचाने के लिए हैं ,मगर हर वो परदा जो अपनी चमड़ी के दो रंगों को छुपाने और बचाने के काम आए वो कहाँ तक अच्छा हैं ,ये हमें सोचना हैं ,शुरुआत इंदौर के पुराने लोगों से हो तो और अच्छा हैं ,के हम पुनः परिभाषित करें इस परदे को ,क्या हैं ये और क्यूँ हैं ,एक शिक्षक होने के नाते ,हर बार जब हमारी student को हम शहर मैं इस दशा मैं देखते हैं परदे का प्रयोग अपने हठधर्मी स्वभाव की रक्षा करते हुए ,बाइक्स के पीछे चेहरा छुपाते हुए घूमते हुए ,हम शर्मसार होते हैं ,की एथिक्स (यह मैनेजमेंट शिक्षा की एक ब्रांच है जिसमे हम सिखाते है की धर्म व्यापार के साथ हो और इमानदार हो तभी अच्छा ) पढ़ना और उसे किसी के जीवन मैं लाना दोनों मैं बहुत अन्तर हैं ,निरर्थक लगता है एक trainer होना जो भविष्य बनाता है ,जिसके दो पहलु हैं जो अनसुलझे और भद्दे हैं , मेरी कोशिश हैं परदे को पुनाह्परिभाषित करने की ताकि इंदौर साफ़ हो ,यहाँ की मलिनता हटे ,और दाग लगाने वाले समझे या समझाए जाएँ किसी भी तरह से |
अपने विचार नीचे प्रेषित करें |
Wednesday, July 23, 2008
अपने लक्ष्य को पाने के लिए केवल लक्ष्य पर केंद्रित होना जरुरी है
अपने लक्ष्य को पाने के लिए केवल लक्ष्य पर केंद्रित होना जरुरी है ,वो जो लक्ष्य को पाने के दरमियान बीच में पड़ने वाली छोटी मोटी समस्याओं या चाल माया प्रलोभन में फंस जाते हैं ,वो लक्ष्य से दिग्भ्रमित होकर उससे दूर होते चले जाते हैं ,और अपना लक्ष्य कभी नहीं पा पाते हैं |
अर्जुन के लक्ष्य भेदन की चिडिया की आँख वाली कहानी सभी ने सुनी होगी ,मगर ये कहानी लक्ष्य पानी के दरमियान आने वाली परेशानियों के अलावे प्रलोभन से सम्बन्ध रखती है |
काठ कुछ इस तरह है ,एक रजा एक दिन अपने राज्य में मुनादी पिटवाता है की ,महीने के आखिरी दिन जो जो मुझसे मिलने आएगा में उसे अपने राज्य का एक हिस्सा देता जाऊँगा ,राजा के इस तरह के निर्णय पर उसके मंत्रियों और सभासदों ने उसे बहुत समझाया की राजन अगर इस तरह के निरे उपाय से आप अपना राज्य बाटेंगे तो आपका राज्य तो समाप्ति पर पहुँच जायेगा ,इस पर राजा ने बोला की जो में बोल रहा हूँ वोह राज्य हित में ही है तो मुझे वोही करने दो|
जिस दिन लोगो को राजा से मिलने आना था उस दिन राजा ने बहुत ही बढियां उत्सव की तैयारियां कारवांई ,भोग विलास नृत्य और सारे इन्तेजाम करवाए और मेला जैसा माहौल बना के रख दिया ,शराब और नर्तकों से पाट के रख दिया अपने सभागार को ,और अपने द्वार के सामने शस्त्रों से सजे सैनिक लगाकर लोगों के आने का इन्तेज़ार करने लगा | मेला शुरू हुआ और राजा का इन्तेज़ार भी लेकिन शाम होते होते कोई भी उस तक ना आया ,मंत्री को बड़ा ही आश्चर्य हुआ की कोई क्यूँ मुफ्त में बटने वाला राज्य लेने के लिए आगे नही आया |
असल में राज्य के सारे लोग सुरा और काम में ऐसे डूबे की उन्हें राजा के पास जाने की सुध ही नहीं रही ,कुछ नशे में डूबे रहे ,कुछ नाचने वाली लड़कियों में डूब गए ,कुछ उत्सव के आनंद में सब भूल गए ,लेकिन उनमें एक ऐसा भी आदमी था जो हर छलावे को छोड़ता हुआ राजा के पास जाने की कोशिश कर रहा था ,ना उसे मदिरा रोक पायी ना ही नृत्य और काम ,वोह तो बस राजा से मिलने के नशे में राजा के पास पहुच गया ,तब राजा ने अपने मंत्री को बोला की यह है हमारे राज्य का उत्तराधिकारी क्यूंकि हमारे राज्य में केवल इसके लक्ष्य को कोई नहीं रोक पाया और राजा ने अपना सारा राज्य उसे सौंप दिया |
कथा का सार ये की जब आप किसी लक्ष्य को पाने के लिए बिना किसी प्रलोभन या प्रपंच में फंसे आगे बढ़ते है तो आपका लक्ष्य आपके और भी नजदीक आया जाता है |इस लिए लक्ष्य पाने के लियी रास्ते में आने वाले छोटे मोटे प्रलोभन और समस्याओं को दरकिनार कर देना चाहिए |
अर्जुन के लक्ष्य भेदन की चिडिया की आँख वाली कहानी सभी ने सुनी होगी ,मगर ये कहानी लक्ष्य पानी के दरमियान आने वाली परेशानियों के अलावे प्रलोभन से सम्बन्ध रखती है |
काठ कुछ इस तरह है ,एक रजा एक दिन अपने राज्य में मुनादी पिटवाता है की ,महीने के आखिरी दिन जो जो मुझसे मिलने आएगा में उसे अपने राज्य का एक हिस्सा देता जाऊँगा ,राजा के इस तरह के निर्णय पर उसके मंत्रियों और सभासदों ने उसे बहुत समझाया की राजन अगर इस तरह के निरे उपाय से आप अपना राज्य बाटेंगे तो आपका राज्य तो समाप्ति पर पहुँच जायेगा ,इस पर राजा ने बोला की जो में बोल रहा हूँ वोह राज्य हित में ही है तो मुझे वोही करने दो|
जिस दिन लोगो को राजा से मिलने आना था उस दिन राजा ने बहुत ही बढियां उत्सव की तैयारियां कारवांई ,भोग विलास नृत्य और सारे इन्तेजाम करवाए और मेला जैसा माहौल बना के रख दिया ,शराब और नर्तकों से पाट के रख दिया अपने सभागार को ,और अपने द्वार के सामने शस्त्रों से सजे सैनिक लगाकर लोगों के आने का इन्तेज़ार करने लगा | मेला शुरू हुआ और राजा का इन्तेज़ार भी लेकिन शाम होते होते कोई भी उस तक ना आया ,मंत्री को बड़ा ही आश्चर्य हुआ की कोई क्यूँ मुफ्त में बटने वाला राज्य लेने के लिए आगे नही आया |
असल में राज्य के सारे लोग सुरा और काम में ऐसे डूबे की उन्हें राजा के पास जाने की सुध ही नहीं रही ,कुछ नशे में डूबे रहे ,कुछ नाचने वाली लड़कियों में डूब गए ,कुछ उत्सव के आनंद में सब भूल गए ,लेकिन उनमें एक ऐसा भी आदमी था जो हर छलावे को छोड़ता हुआ राजा के पास जाने की कोशिश कर रहा था ,ना उसे मदिरा रोक पायी ना ही नृत्य और काम ,वोह तो बस राजा से मिलने के नशे में राजा के पास पहुच गया ,तब राजा ने अपने मंत्री को बोला की यह है हमारे राज्य का उत्तराधिकारी क्यूंकि हमारे राज्य में केवल इसके लक्ष्य को कोई नहीं रोक पाया और राजा ने अपना सारा राज्य उसे सौंप दिया |
कथा का सार ये की जब आप किसी लक्ष्य को पाने के लिए बिना किसी प्रलोभन या प्रपंच में फंसे आगे बढ़ते है तो आपका लक्ष्य आपके और भी नजदीक आया जाता है |इस लिए लक्ष्य पाने के लियी रास्ते में आने वाले छोटे मोटे प्रलोभन और समस्याओं को दरकिनार कर देना चाहिए |
Saturday, July 19, 2008
गुरु के साथ किया हुआ छल सरे छलों से भयावह और दुष्परिणाम देने वाला होता है
गुरु के साथ किया हुआ छल सरे छलों से भयावह और दुष्परिणाम देने वाला होता है
आज के समय में ग़लत कार्य, छल,लोगो को धोखा देना ,आम बातें हो गई हैं |लोग सभी के साथ बिना सोचे विचारे छल और कपट करते हैं ,ये कथा छल के दुष्परिणाम से सम्बंधित है ,खासतौर पर गुरु के साथ किया हुआ छल ,पुराने समय में गुरु को सम्मान और पद प्रतिष्ठा देना किसी शिष्य का मूल कर्तव्य होता था |लोग गुरु आदेश को ही सर्वोपरि मानते थे ,राजा बलि जैसे प्रतापी और शूरवीर राजा ने वामन अवतार लिए हुए श्री विष्णु के आगे घुटने टेक दिए थे ,द्रोणाचार्य के सामने एकलव्य ने अपने दाएं हाथ का अंगूठा देकर गुरु शिष्य परम्परा का एक ऐसा उदहारण दिया था जो आज तक अमिट है ,आज के समय में ना तोह गुरु शिष्य परम्परा ही बची है ना ही गुरु का सम्मान जीवित है ,लोग केवल आपसी स्वार्थ निकालने के लिए और छोटे छोटे फायदों के लिए गुरु को धोखा देने में और छल कपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं ,कथा का सार बस येही है की गुरु से किया हुआ छल केवल दुष्परिणाम देता हैं और बहुत ज्यादा भयावह होता है ,इसी सन्दर्भ में कथा आगे है ,महाभारत काल की बात है ,कर्ण को धनुर्विद्या सिखने के लिए श्री परशुराम को गुरु बनने का विचार आता है ,लेकिन वो यह भी जानता है ,की परशुराम कट्टर ब्रह्मण वादी है और किसी क्षत्रिय को ज्ञान नहीं देंगे ,वो केवल ब्रह्मिनो को ही शास्त्र विद्या सिखाते हैं ,यह सब देखकर करना श्री परशुराम के साथ छल करता है ,और एक ब्रह्मण बनकर शस्त्र विद्या ग्रहण कर लेता है ,जब वोह अपनी शस्त्र विद्या में निपुण हो जाता है तब किसी दिन भगवन परशुराम कर्ण के साथ पेड़ की छावं में विश्राम करने के लिए रुक जाते हैं ,और विश्राम करने के लिए कर्ण की गोद में सर रखकर सो जाते हैं ,कर्ण को इस विश्राम के समय कोई जहरीला जीव जांघ पर दंश मार देता है ,और कर्ण की जांघ से खून निकालने लगता है ,कर्ण ये सोचकर की कहीं गुरु की नींद भंग ना हो इस कष्ट को सहता रहता है ,और गुरु के नींद से जागने के इन्तेजार करता है |
काफ़ी समय के बाद जब परशुराम की नींद खुलती है ,वो कर्ण की जांघ से खून बहता हुआ देखकर और कर्ण का संयम और धैर्य देखकर संशय में पड़ जाते हैं ,और कर्ण से पूंछते हैं की तुम ब्रह्मण नहीं हो सकते ,क्यूंकि ब्रह्मण की शक्ति में इतना कष्ट सहना नहीं होता है ,बताओ की तुम किस वर्ण से हो ,और तब कर्ण को सत्य बताना पड़ता है की वोह एक क्षत्रिय है ,कर्ण के इस छल से परशुराम कुपित हो जाते हैं ,और उसे श्राप देते हैं की जो ज्ञान तुमने छल और कपट से अर्जित किया है वोह समय आने पर तुम्हारे काम नहीं आएगा ,और येही महाभारत के युध्द के समय चरितार्थ भी होता है ,अर्जुन के साथ धनुर्युद्ध के समय कर्ण वोह सारा ज्ञान जो परशुराम से सीखा था भूल जाता है और पराजय को प्राप्त हो जाता है ,इसी लिए कभी गुरु के साथ छल और कपट जैसे कार्य नहीं करने चाहिए क्यूंकि इनके दूरगामी परिणाम हमेशा भयावह होते हैं |
अमितोम
Friday, July 11, 2008
ग़लत दिशा आपकी दशा बदल सकती है और ग़लत दशा आपकी दिशा बदल सकती है
ग़लत दिशा आपकी दशा बदल सकती है और ग़लत दशा आपकी दिशा बदल सकती है ,
अमितोम
जीवन में उठाया हुआ एक ग़लत कदम कई पीढियों तक जीवन की दिशा और दशा बदल देता है |लोग बिना सोचे विचारे जीवन में बड़े बड़े निर्णय ले लेते हैं ,वोह यह विचार भी नहीं करते की ,किस निर्णय के क्या दूरगामी परिणाम होंगे ,भविष्य में क्या असर पड़ेगा ,इसी कथन पर एक कथा है ,जो एक राजा की है ,एक बार एक राजा को राज्य छोड़कर भागना पड़ा ,दुश्मनों का वर्चस्व होने के कारण राजा को अपना परिवार लेकर राज्य से भागना पड़ा |
अपने विश्वासपात्र लोगों के पास जाकर राजा गुप्त रूप से रहने लगा ,राजा के साथ उसकी बेटी भी थी ,राज्य छोड़ने के बाद भी राजा ने अपनी बेटी को सारे संस्कार और मान मर्यादाएं सिखायीं ,समय गुजरता गया और बेटी भी उम्र के साथ बड़ी होती गई ,राजा की बेटी को आस पास रहने वाले एक संगीतकार से प्यार हो गया ,और वोह चुपचाप वहां से भागने का विचार बनाने लगी ,इस सब की भनक राजा को ला गई ,राजा सधर्मी और सद्भावी था सो उसने इस सब को सम्हालने की के लिए ख़ुद ही अपनी बेटी की मदद करने का मन बनाया ,उसे पता था की उसकी बेटी ग़लत निर्णय कर रही है और परिणाम भी ग़लत ही भोगेगी ,सो उसे सही राह पे लाने के लिए ,उसने अपनी बेटी के पास जाकर कहा की अगर तुम पलायन करके ही जीवन बसना चाहती हो ,तो मेरी मदद मांगने में क्या जाता है ,इस जंगल में पैदल कितना भागोगी ,मेरे दो घोडों में से एक ले जाओ |बेटी को लगा की उसके पिता उसकी मदद कर रहे है तो घोडे लेकर ही जाना चाहिए |
राजा ने अपनी बेटी के सामने दो घोडे खड़े कर दिए ,एक बूढा घोड़ा और एक जवान घोडी ,और कहा की इन दोनों में अपने अपने गुन हैं ,जो घोड़ा तुम्हें ठीक लगे उसे लेकर चली जाओ ,बेटी के मन में गुणों की बात सुनकर कुछ आशंका आई सो उसने अपने पिता से पूंछा की आप ही इनके गुन बता दो की क्यूँ में इनमे से कोई एक घोड़ा लेकर जाऊं ,राजा ने दोनों घोडो के बारे में बताना शुरू किया ,की यह बूढा घोड़ा सामान्य गति से दौड़ता है ,ख़ुद के निर्णय पर चलता है ,खानदानी है ,हमारे खानदान की इसके खानदान के कई पूर्वजों ने सेवा की है ,इसमें कोई कमी नहीं है ,है तो बस यह की यह धीमे धीमे और साधारण गति से चलता है ,और मेरी राय में तुम्हें येही घोड़ा ले जाना चाहिए ,बेटी को लगा की पिता मदद के नाम पर धीमी चल वाला घोड़ा देके उसके किए धराये पे पानी फेरना चाहते हैं सो वोह पिता से बोली की आप ,मुझे यह जवान घोडी क्यूँ नहीं देते ,क्या गुन हैं इसके यह भी बताईये ,राजा बोला की यह घोडी जवान है ,हष्ट पुष्ट है ,बिजली की तेजी से भागती है ,सब गुन ही गुन हैं इसमें,बस एक दुर्गुण है इसमें ,इसकी माँ की माँ ने अपने बच्चे को जन्मे देते समय पानी देख लिया था और पानी से डरने लगी थी तोह यह पानी से डरने का गुन इसके सारे खानदान में आ गया है ,यह दौड़ती तेज़ है मगर पानी देखकर ठिठक जाती है |और निरंकुश हो जाती है यहाँ तक की स्वर को भी चोट पहुंचा देती है |
राजा का इतना कहना था की उसकी बेटी उल्टे पांव वापस लौट गई और घर से भागने का विचार छोड़ दिया ,कारण था वो संस्कार जो राजा ने उसे दिए थे ,समझार को इशारा काफ़ी ,बूढा घोड़ा दिखाकर राजा ने अपने आप को इंगित किया था ,अपने खानदान को दिखाया था ,बताया था की धीमे चलने से और सही निर्णय से जीवन सुधार जा सका है ,वहीँ उस जवान घोडी को दिखाकर उसने अपनी बेटी की होने वाली दुराशा दिखाई थी मकी जब दुर्गुण ,और ग़लत निर्णय ले लिए जाते हैं तो वोह खून का हिस्सा बनकर कई पीढियां बर्बाद कर देते हैं ,जल्दबाजी के निर्णय केवल कष्ट देते है और कुछ भी नहीं |जब घोडी की माँ की माँ के गुन और डर ,आज कई पीढियों के बाद घोडी में मौजूद है तोह स्वाभाविक है की बेटी का आज उठाया हुआ ग़लत कदम कई पीढियों की दिशा और दशा बदल देगा |येही वह ज्ञान था जो एक बूढा बाप अपनी जवान बेटी को देना चाहता था |
निर्णय भविष्य देखके लिए जाएँ तो अच्छा ,निर्णय शास्त्र सांगत हो तो अच्छा ,निर्णय पारिवारिक सहमती और सन्मति से हो तो अच्छा ,और सबसे बड़ी बात निर्णय धीरे धीरे और सोचसमझकर लिए जाय तो बहुत ही अच्छा क्यूंकि
ग़लत दिशा आपकी दशा बदल सकती है और ग़लत दिशा आपकी दशा बदल सकती हीअपने विश्वासपात्र लोगों के पास जाकर राजा गुप्त रूप से रहने लगा ,राजा के साथ उसकी बेटी भी थी ,राज्य छोड़ने के बाद भी राजा ने अपनी बेटी को सारे संस्कार और मान मर्यादाएं सिखायीं ,समय गुजरता गया और बेटी भी उम्र के साथ बड़ी होती गई ,राजा की बेटी को आस पास रहने वाले एक संगीतकार से प्यार हो गया ,और वोह चुपचाप वहां से भागने का विचार बनाने लगी ,इस सब की भनक राजा को ला गई ,राजा सधर्मी और सद्भावी था सो उसने इस सब को सम्हालने की के लिए ख़ुद ही अपनी बेटी की मदद करने का मन बनाया ,उसे पता था की उसकी बेटी ग़लत निर्णय कर रही है और परिणाम भी ग़लत ही भोगेगी ,सो उसे सही राह पे लाने के लिए ,उसने अपनी बेटी के पास जाकर कहा की अगर तुम पलायन करके ही जीवन बसना चाहती हो ,तो मेरी मदद मांगने में क्या जाता है ,इस जंगल में पैदल कितना भागोगी ,मेरे दो घोडों में से एक ले जाओ |बेटी को लगा की उसके पिता उसकी मदद कर रहे है तो घोडे लेकर ही जाना चाहिए |
राजा ने अपनी बेटी के सामने दो घोडे खड़े कर दिए ,एक बूढा घोड़ा और एक जवान घोडी ,और कहा की इन दोनों में अपने अपने गुन हैं ,जो घोड़ा तुम्हें ठीक लगे उसे लेकर चली जाओ ,बेटी के मन में गुणों की बात सुनकर कुछ आशंका आई सो उसने अपने पिता से पूंछा की आप ही इनके गुन बता दो की क्यूँ में इनमे से कोई एक घोड़ा लेकर जाऊं ,राजा ने दोनों घोडो के बारे में बताना शुरू किया ,की यह बूढा घोड़ा सामान्य गति से दौड़ता है ,ख़ुद के निर्णय पर चलता है ,खानदानी है ,हमारे खानदान की इसके खानदान के कई पूर्वजों ने सेवा की है ,इसमें कोई कमी नहीं है ,है तो बस यह की यह धीमे धीमे और साधारण गति से चलता है ,और मेरी राय में तुम्हें येही घोड़ा ले जाना चाहिए ,बेटी को लगा की पिता मदद के नाम पर धीमी चल वाला घोड़ा देके उसके किए धराये पे पानी फेरना चाहते हैं सो वोह पिता से बोली की आप ,मुझे यह जवान घोडी क्यूँ नहीं देते ,क्या गुन हैं इसके यह भी बताईये ,राजा बोला की यह घोडी जवान है ,हष्ट पुष्ट है ,बिजली की तेजी से भागती है ,सब गुन ही गुन हैं इसमें,बस एक दुर्गुण है इसमें ,इसकी माँ की माँ ने अपने बच्चे को जन्मे देते समय पानी देख लिया था और पानी से डरने लगी थी तोह यह पानी से डरने का गुन इसके सारे खानदान में आ गया है ,यह दौड़ती तेज़ है मगर पानी देखकर ठिठक जाती है |और निरंकुश हो जाती है यहाँ तक की स्वर को भी चोट पहुंचा देती है |
राजा का इतना कहना था की उसकी बेटी उल्टे पांव वापस लौट गई और घर से भागने का विचार छोड़ दिया ,कारण था वो संस्कार जो राजा ने उसे दिए थे ,समझार को इशारा काफ़ी ,बूढा घोड़ा दिखाकर राजा ने अपने आप को इंगित किया था ,अपने खानदान को दिखाया था ,बताया था की धीमे चलने से और सही निर्णय से जीवन सुधार जा सका है ,वहीँ उस जवान घोडी को दिखाकर उसने अपनी बेटी की होने वाली दुराशा दिखाई थी मकी जब दुर्गुण ,और ग़लत निर्णय ले लिए जाते हैं तो वोह खून का हिस्सा बनकर कई पीढियां बर्बाद कर देते हैं ,जल्दबाजी के निर्णय केवल कष्ट देते है और कुछ भी नहीं |जब घोडी की माँ की माँ के गुन और डर ,आज कई पीढियों के बाद घोडी में मौजूद है तोह स्वाभाविक है की बेटी का आज उठाया हुआ ग़लत कदम कई पीढियों की दिशा और दशा बदल देगा |येही वह ज्ञान था जो एक बूढा बाप अपनी जवान बेटी को देना चाहता था |
निर्णय भविष्य देखके लिए जाएँ तो अच्छा ,निर्णय शास्त्र सांगत हो तो अच्छा ,निर्णय पारिवारिक सहमती और सन्मति से हो तो अच्छा ,और सबसे बड़ी बात निर्णय धीरे धीरे और सोचसमझकर लिए जाय तो बहुत ही अच्छा क्यूंकि
अमितोम
Subscribe to:
Posts (Atom)