Wednesday, July 9, 2008

यह जीवन कर्मो को करने के लिए है ,ना की फल की चिंता करने के लिए

यह जीवन कर्मो को करने के लिए है ,ना की फल की चिंता करने के लिए ,व्यक्ति को अपने कर्म करते रहना चाहिए ,बिना यह विचारे की उसके कर्मो का फल उसे कब कैसे मिलेगे ,एक तर्क येभी है कि व्यक्ति के कर्म उसके भविष्य के जीवन के निर्माण करते करते सद्कर्मी अच्छा जीवन और मोक्ष पाते हैं और दुष्कर्मी बार बार इस दुनिया में कष्ट भोगने को आते हैं ,इसी परिपक्ष्य में एक कथा है |
एक साधू ब्रह्म मुहुर्त में उठकर सूर्य नमस्कार करने के लिए नदी में गया और भगवन से रोज कि तरह प्रार्थना करने लगा ,उसी समय उसे पानी में डूबता हुआ एक बिच्छू दिखा ,उसे पानी में डूबता हुआ देखकर साधू को उसपे दया आई और सद्कर्मी स्वभाव का होने के कारन उसने उसे बचने कि कोशिश में उसे हाथ से उठाकर बचने कि कोशिश की ,जितनी बार साहू ने उसे उठाने की कोशिश की उतनी ही बार साधू को बिच्छू ने अपने डंक से दंष दिया ,साधू बार बार बिच्छू के डंक से चोट खा रहा था और दर्द से तड़पता हुआ भी बिच्छू को बचने की कोशिश कर रहा था , ये सब तट पर खड़ा हुआ एक आदमी देख रहा था और उसे यह सब बड़ा हास्यास्पद लग रहा था |साधू को कई डंक खाने के बाद भी बिच्छू के लिए स्नेहिल होके बचाते हुए देखकर उससे रहा नहीं गया और उसने साधू से पुँछ लिया की हे महात्मन ,"मैं आपको कितने कष्ट के साथ कितनी देर से इस बिच्छू के डंक खाता देख रहा हूँ और तोह भी आप की दया है की खत्म होती ही नहीं है ,आप डंक खाते हैं कष्ट मैं तड़पते हैं और फ़िर से इस निरे बिच्छू को बचाने मैं लग जाते हैं ,क्या कारण है इसका ,क्यूँ इतना कष्ट सह रहे हैं आप ,मरने दीजिये इस बिच्छू को ,ऐसे दुष्ट को बचाने का कोई फायदा नहीं है |"
इस पर साधू का जवाब था की हे भले इंसान ,मुझे अच्छा लगा कि तुम लोगो का भला सोचते हो ,लेकिन इस सब को जो तुम देख रहे हो ,तुम्हे क्या समझ रहा है ,मैं एक साधू हूँ मेरा स्वभाव है जनसेवा और जीव सेवा ,मैं वही कर रहा हूँ और मुझे ये बिच्छू बार बार डंक मारकर याद दिला रहा है कि अपने से पीछे मत हटो ,जब यह बिच्छू अपना डंक माने का स्वभाव छोड़ने को तैयार नहीं है तोह मैं तो एक साधू ठहरा मैं कैसे अपना भला करने का स्वभाव छोडूं |यह जितनी बार मुझे डंक मारता है ,उतनी बार मुझे मेरे कर्मो कि और झुकाता है ऐसा लगता है कि यह मूक जीव मुझे अहसास दिला रहा हो कि जब यह अपनी दुष्ट प्रकृति नहीं छोड़ना चाहता तोह मैं कैसे अपनी साद प्रवृत्ति छोडूं |इसी लिए मैं और यह अपने अपने कर्म कर रहे हैं ,क्यूंकि ईश्वर ने हमें हमारे कर्मो को करने के लिए ही जन्म दिया है ,परिणामो को सोचने के लिए नहीं |
कथा का सार ये कि आप अपने कर्म करें परिणाम कि चिंता करना हमारा काम नहीं है |

2 comments:

Anil Kumar said...

बहुत ही अच्छी कहानी के मध्यम से गीता का एक पाठ पढाया है आपने. अति सुंदर!

Amitom said...
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